हत्या (Murder)

किसी ऐसे कर्ता को जान-बूझकर मार डालना जिसने मरने की सहमति नहीं दी। हत्या समस्त हानियों में अनूठी है: यह उस एकमात्र कर्ता को ही नष्ट कर देती है जिसके पास इससे उत्पन्न नैतिक ऋण को बंद करने की संप्रभु शक्ति थी। पीड़ित न तो वसूली (प्रतिकार) कर सकता है, न मुक्ति (क्षमा) दे सकता है, और न ही किसी प्रतिनिधि को अधिदेश प्रदान कर सकता है। इसलिए हत्या स्थायी, अबंधनीय दोष उत्पन्न करती है और अपराधी को पारस्परिकता की व्यवस्था से बाहर रख देती है। देखें: विधि-बहिष्कृत।